लखनऊ। यदि मुहावरे में कहें तो उत्तर प्रदेश में बीस-बाइस के मुकाबले की तैयारी चल रही है और विपक्ष में उन्नीस-बीस की लड़ाई फंसी है। राज्यसभा चुनाव में सपा और बसपा के बीच जो कुछ हुआ, वह अनायास ही उजागर कर गया कि सियासी पुलाव में कौन-कौन से फ्लेवर डाले जा रहे। सत्ता पक्ष को लगता है कि राममंदिर के रूप में उसके पास मजबूत आभामंडल पहले से मौजूद है। यदि विपक्ष खेल की पिच बदलने में सफल नहीं हुआ तो उसकी राह आसान नहीं, तो कठिन भी न होगी। इसलिए, पहला सवाल यह नहीं है कि योगी प्रदेश में भाजपा का राज कब तक कायम रख पाएंगे। 

सपा स्वयं को स्वाभाविक रूप से मुख्य विपक्षी दल मानती है

 बीता सप्ताह ‘भाजपा के मुकाबिल कौन?’ की ही खींचतान का साक्षी रहा उत्तर प्रदेश। अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी स्वयं को स्वाभाविक रूप से मुख्य विपक्षी दल मानती है। पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजों के आधार पर यह दावा बहुजन समाज पार्टी का भी बनता है, लेकिन इधर प्रियंका की कांग्रेस ने सड़क की राजनीति जिंदा करने की कोशिश कर अपनी दावेदारी भी ठोक दी है। अब तीनों खुद को एक दूसरे पर बीस साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। हाथरस के बूलगढ़ी प्रकरण में यह दिखा भी। विपक्ष की तरफ से कांग्रेस ने शुरुआती मजमा लूट लिया, सपा नेता अपनी सक्रियता की सफाई देने के अंदाज में नजर आए। बसपा अध्यक्ष के ट्वीट में भी ऐसी ही छटपटाहट दिखी। सरकार को तो वह सलाह ही देती नजर आईं, लेकिन कांग्रेस पर राजस्थान तक हमलावर रहीं। राज्यसभा चुनाव में सपा के गुनाह बेलज्जत की सियासी इज्जत बस यह संदेश देने तक सीमित थी कि भाजपा की बी-टीम की छवि में उलझती जा रही बसपा की भगदड़ को उसी के खेमे में ठहराव मिल सकता है।

दलित-मुस्लिम-ब्राह्मण का विनिंग कांबिनेशन

बसपा इधर सेल्फ गोल ज्यादा मार रही है। राज्यसभा चुनाव के समय मायावती का बयान कि वह सपा को हराने के लिए भाजपा को भी जिता सकती है, ऐसा सेल्फ गोल था कि उसकी भरपाई बाद में आई उनकी सफाई से भी नहीं हो पाई। हालांकि दलित वोटों के सहारे वह अपनी संभावनाएं देखने में जुटी हैं, लेकिन पश्चिम में भीम आर्मी इन वोटों में सेंध भी लगा रही है। बसपा की कोशिश 2007 में पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाने में अहम रहे दलित-मुस्लिम-ब्राह्मण का विनिंग कांबिनेशन फिर खड़ा करने की है, लेकिन अब इसमें कई पेच दिखाई देने लगे हैं। यह कांबिनेशन 2014 की मोदी लहर में टूट चुका है और इसे जोड़ पाना आसान नहीं है। वर्ष 2022 के लिए बसपा के पास कोई युवा चेहरा न होना ऐसी कमजोरी है, जो उसे मुख्य विपक्षी दल की लड़ाई से बहुत दूर ले जाती है। लखनऊ-नोएडा के पार्को में जीते जी अपनी आदमकद प्रतिमा लगवा चुकीं बसपा अध्यक्ष को भविष्य की बहुत फिक्र दिखती भी नहीं। ऐसे में मुख्य विपक्ष की लड़ाई में कौन एक दूसरे के मुकाबले उन्नीस या बीस है, इसकी वास्तविक जोर आजमाइश समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच ही सिमट रही। सपा के पास जुझारू नेटवर्क तो है, लेकिन सक्रियता की कमी है। मुलायम सिंह यादव के सक्रिय रहते यह चिंता नहीं थी। फिर भी यह मजबूत पक्ष है कि कांग्रेस से छिटकी पूर्व सांसद अनु टंडन जैसों को सपा में ही पनाह दिखती है।

असल परेशानी पुराने कांग्रेसी कल्चर को बदलने की

उधर, प्रियंका ने मुद्दों को गुरिल्ला शैली में लपकने और टीआरपी के खेल में उलङो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को अपने पीछे खड़ा होने को बाध्य करने की रणनीति से कोमा में पड़ी कांग्रेस में अंगड़ाई तो भर ही दी है। लेकिन, उनकी असल परेशानी पुराने कांग्रेसी कल्चर को बदलने की है। प्रियंका हाथरस में महिला सम्मान की लड़ाई लड़कर फारिग भी न हुई थीं कि जालौन में उनके जिलाध्यक्ष अनुज मिश्र अपनी ही पार्टी की एक पूर्व महिला पदाधिकारी से सरेआम पिटकर धड़ाम हो गए। आगरा में जिलाध्यक्ष मनोज दीक्षित ने सड़कों पर कार्यकर्ताओं को उतारा तो सक्रियता के कुछ महीनों बाद अगस्त में उनका वीडियो वायरल हो गया, जिसमें वह निजी बिजली वितरण कंपनी के खिलाफ आंदोलन वापस लेने के लिए सौदेबाजी करते नजर आए। ऐसी ही दिक्कतें हैं। इस खेल में ‘आप’ की मौजूदगी भी कहीं न कहीं कुछ असर दिखा सकती है।

By-राजू मिश्र

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